सिंध प्रान्त (पाकिस्तान) के लड़काना ज़िले में स्थित 'मोएन जोदणों' यानि मुर्दों का टीला जिसे भारत-पाक के
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| इन बस्तियों के लोग कहाँ जा के छुप गए? |
'प्रागैतिक इतिहास के सांस्कृतिक भग्नावशेष' भी कहा जाता है, वहाँ, कभी यह शहर सिंध नदी और घग्गर-बेकरा के मध्य में अवस्थित था. घग्गर-बेकरा नदी प्रायः सूख चुकी है। पुरातत्वेत्ताओं का मानना है कि यह शहर अत्यन्त आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग-विशेषज्ञों की कुशल निर्माण परिकल्पना, वास्तु और शिल्प-कला की अद्भुत प्रस्तुति है. इसका निर्माण लगभग २६वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास हुआ होगा, किन्तु १९०० ईसा पूर्व में जब इस शहर की मानव-संस्कृति का ह्रास होना शुरू हुआ तो यहाँ से मनुष्यों के साथ उनके परिवारों का भी पलायन शुरू होने लगा और खाली होते शहर पर रेत की परतें चढ़ती नज़र आने लगीं।
३७०० वर्षों तक यह शहर रेत की क़ब्र में दफ्न अपने ऐतिहासिक कुम्भकरण की नींद में ऐसे सोता रहा मानों किसी ऐसी शताब्दी की राह देख रहा हो जहां के लोग उसकी तबाही का राज़ सुनने के लिए लालायित होंगे और नींद का कुम्भकरण जागकर समस्त संसार को अपनी तबाही का मर्सिया सुनाएगा।
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| इन शोखियों को देख, ज़माने बदल गये। |
नींद के उस कुम्भकरण की आँख तब खुली जब १९२२ में कुछ बौद्ध अपनी यात्रा के दौरान यहाँ के स्तूप को देखकर चौंके और रुककर उन्होंने महात्मा बुद्ध की पूजा की. वे आगे बढे और १९३० तक रेत की परतें और मोटी हो गयीं। १९३० में जॉन मार्शल, डी. के. दीक्षित और अर्नस्ट मेक्वाये के नेतृत्व में इस गुम हो गए शहर का पता लगाने के उद्देश्य से खुदाई की योजना का काम शुरू किया गया जिसे १९४५ में मार्टिंज़ वेलर और अहमद हसन दानी ने आगे बढ़ाया। योजना का कार्य डॉ. जार्ज ऍफ़ डलास के नतृत्व में १९६५ तक चलता रहा. तभी पता चला कि खुदाई में इमारतों को नुक़सान हो रहा है, इसलिए खड़े को रोक दिया गया। तब आगे क्या हुआ.…?
संपर्क : +९१ 9350 934 635 (पढ़िए दूसरी कड़ी में. ...... जारी /-२
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