पैगाम-इ-हुसैनी जो १४०० साल बाद भी सर चढ़कर बोलता है/Ranjan Zaidi
नवभारत टाइम्स ( 15 नवम्बर , 2013 ) के अंक में फ़िरोज़ अशरफ का लेख ' क्या हुआ था 10 मुहर्रम के दिन ?' ( पृष्ठ 16) प्रकाशित हुआ है. समूचे लेख पर टिप्पणी न कर मैं मात्र उस भूल की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूँ जिसमें बताया गया है कि हिंदुस्तान में ताजियों की शुरुआत तैमूर लंग के बीमार होने के बाद से हुई थी , गलत है. ताज़िए मूलतः उन मराठी , दक्षिण भारतीय और बंगाली सैनिकों के उस त्यौहार का इस्लामीकरण है जो आज भी विभिन्न धार्मिक यात्राओं के जुलूसों की शक्ल में मनाया जाता है. धर्म-परिवर्तित सैनिकों में नव-मुस्लिम सैनिक अपनी आस्थाओं के साथ अपने परिवेश से अपने विश्वास और धार्मिक परम्पराएं व आस्थाएं लेकर मुस्लमान बने थे. दुनिया के हर कोने में जहाँ इस्लाम फैला , वहाँ की नौ मुस्लिम आबादी अपनी पुरातन आस्थाओं के साथ अपने परिवेश से अपने विश्वास और धार्मिक परम्पराएं व आस्थाएं लेकर ही इस्लाम में दाखिल हुई थी. इसलिए इस्लामिक परम्पराएं कहीं भी सामानधर्मा नहीं रही. शीयों में भी बलोच...