हिंदी कहानी /नेमी बाबू : रंजन ज़ैदी https://samagravicharmanch2017.blogspot.com/2014/07/blog-post.html
व ह दिसम्बर की एक रात थी। किसी को सीआफ कर मैं स्टेशन से घर लौट रह था। ठण्ड थी कि गर्म कपड़ों को भी भेदकर सुई की तरह चुभ रही थी। बाइक पर चलना दुश्वार हो रहा था जबकि दोनों हाथ ग्लव्ज़ से ढके हुये थे । आहिस्ता - आहिस्ता चलते हुये नाका चौराहे पर चौरसिया पान भँडार के पास बाइक खड़ी कर पान बनवाने ही जा रहा था कि बड़े ही अप्रत्याशित ढंग से नेमी बाबू सामने आ गये। मुझे वह उस समय एक ऐसे दरख़्त की तरह लग रहे थे जो हवा में झूलने लगता है । कच्ची शराब की दुर्गन्ध यानी उसका भभका आया और पीछे धकेलकर आगे निकल गया। नेमी बाबू को देखकर मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था। और धुंध से भरी उस रात एक बार फिर हम यायावर होकर सड़कों पर आवारगी करने लग गये थे। आज मेरे भीतर भी छुपा हुआ अपरिपक्व कवि मुखर हो उठा था। नेमी बाबू ने मुझे भी सुरूर के अजाने तालाब मेँ ऐसा धकेल दिया था कि बस ...