हिंदी कहानी /नेमी बाबू : रंजन ज़ैदी https://samagravicharmanch2017.blogspot.com/2014/07/blog-post.html
वह दिसम्बर की एक रात थी। किसी को सीआफ कर मैं स्टेशन से घर लौट रह था। ठण्ड थी कि गर्म कपड़ों को भी भेदकर सुई की तरह चुभ रही थी। बाइक पर चलना दुश्वार हो रहा था जबकि दोनों हाथ ग्लव्ज़ से ढके हुये थे । आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुये नाका चौराहे पर चौरसिया पान भँडार के पास बाइक खड़ी कर पान बनवाने ही जा रहा था कि बड़े ही अप्रत्याशित ढंग से नेमी बाबू सामने आ गये। मुझे वह उस समय एक ऐसे दरख़्त की तरह लग रहे थे जो हवा में झूलने लगता है । कच्ची शराब की दुर्गन्ध यानी उसका भभका आया और पीछे धकेलकर आगे निकल गया। नेमी बाबू को देखकर मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था।
और धुंध
से भरी
उस रात
एक बार फिर
हम यायावर
होकर सड़कों
पर आवारगी
करने लग
गये थे। आज मेरे भीतर भी छुपा हुआ अपरिपक्व कवि मुखर हो उठा था। नेमी बाबू ने मुझे भी सुरूर के अजाने तालाब मेँ ऐसा धकेल दिया
था कि बस, हवा के कंधों पर सवार होकर मैँ
उड़ता ही चला
जा रहा था। बाईक के पीछे बैठे नेमी बाबू क्या कह् रहे थे, मैँ उनसे क्या सुन रहा था, इसका मुझे बिल्कुल भी इल्म नहीँ था। एक तरह की ख़ुशी ज़रूर
थी, अहसास था कि नेमी बाबू कोलकत्ता से लौट आये हैं और अब हम फिर से एक साथ काम कर सकेंगे।
उस सुरूर में पता ही नहीं चला कि हम शहर के कर्फ्यूग्रस्त क्षेत्र में आ गए हैं। हर तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ था। नेमी बाबू को ज़ोर का पेशाब लगा तो वह सड़क के किनारे ही पजामा खोलकर पेशाब करने लगे, मैं उनका अनुकरण करने लगा। दूर से हेडलाइट्स करीब आती दिखाई दीं। नेमी बाबू लहराते हुए भी संभल गये, बोले," हमें इधर नहीं आना चाहिये था।तुम्हें पता होना चाहिए था कि इधर दंगा हो चुका है।"
बीड़ी सुलगाकर उन्होंने कहा,"जब दंगे होते हैं तो आदमी की पहचान छिन जाती है बाबू मोशाय! गरीबों की बस्तियों की आग और रईसों के मकानो पर हथियारबंद पुलिस पहरा देती है। समझे? यह लो… बाबू मोशाय! बोतल खाली किये देते है। तुम भी क्य याद करोगे । चलो जल्दी करो, इधर मेरे को कुछ ठीक नहीं लगता है। अपन लफड़ा नहीं मांगने का। इधर देर तक रुकने का भी नहीं…..।"
इसी समय दो आवारा कुत्ते परस्पर लड़ते हुये हलवाई की दुकान की भट्टी की ओर चले गए। भट्टी की राख पर पहले से ही कुण्ड्ली मारे कुत्ते बदन को गर्मी देने मेँ लगे हुये थे। नेमी बाबू को अकस्मात हॅंसी सी आ गई थी।
मुझे लगा मानो मैं अब बाईक नहीं चला पाऊंगा। नशा सर चढ़कर बोलने लगा था। नेमी बाबू की आवाज़ भी अब दूर से आती महसूस हो रही थी। रोशनियों के समंदर में मानो जहाज़ों का बेङा मुझे उडाए लिये जा रहा था। कानों से बहुत सी आवाज़ें टकराने लगी थीं। बहुत सी आवाजें, बहुत सी सीटियों के बजने का शोर। फिर…?
आँख खुली तो खुद को हवालात मेँ पाकर मुझे आश्चर्य हुआ। आश्चर्य यह कि मेरे साथ नेमी बाबू किसी भी कोने में नहीं थे। रात पकडे गए असामाजिक तत्वों में पुलिस ने मुझे भी शामिल कर लिया था।
नेमी बाबू के बारे में मुझे किसी से कोई भी विशेष जानकारी उपलब्ध नहीँ हो पाई। यदि आपको उनके बारे में कुछ भी पता चले तो मुझे ज़रूर बताइयेगा।
मुझे अभी उनसे यह पता करना है कि इंसानों की बस्तियों में क्या आज भी दंगे क्यों होते हैं?

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