वो शहर, जो कल थे हरे-भरे : ( 3 ) /डॉ. रंजन ज़ैदी
ब्रिटेन के पुरातत्व-विशेषज्ञ जॉन मार्शेल के पास २० वर्षों तक तक्षिला के इलाके की खुदाई का अनुभव था. खुदाई के दौरान जिन तीन नगरों का पता चला था उनमें हथियाल नामक नगर अन्य दो नगरों में कदाचित द्वतीय शताब्दी से चौथी शताब्दी के बताये जाते हैं. खुदाई के दौरान वहाँ से पाई जाने वाली वस्तुओं के अध्ययन से अनुमान लगाया गया कि यह शहर अपने समय में अत्यंत समृद्ध और धनधान्यपूर्ण रहा होगा जिसका विस्तार ग्रामीण क्षेत्रों तक दिखाई देता है.
दूसरी शताब्दी के अन्य शहरों में सरकेब और सरसुख भी निश्चय ही अपने समय के महत्वपूर्ण नगरों में मने जाते रहे होंगे।
खुदाई में मिले सबूतों से इस बात का भी पता चलता है कि तक्षिला में अन्य विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त अंतर्राष्टीय ख्याति का एक विश्वविद्यालय भी रहा था जहाँ संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए देश-विदेश से छात्र यहाँ आया करते थे.
१९८० में यूनेस्को ने तक्षिला को विश्व की बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल कर लिया लेकिन 'ग्लोबल हेरिटेज फंड' की एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान स्थित इस क्षेत्र में निरंतर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले ऐसे अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे है जिनका प्रभाव खुदाई के कार्यों व प्राप्त बहुमूल्य ऐतिहासिक वस्तुओं पर तो पड़ ही रहा है, संग्रहालय में रखी गई वस्तुओं को भी काफी नुकसान पहुँच रहा है. जैसे हाल में ही होने वाले 'सिंध फैस्टिवल' के आयोजन की योजना से ऐतिहासिक खंड़हरों पर फैस्टिवल-मंच का जो निर्माण किया गया है, उससे अंरराष्ट्रीय बिरादरी का चिंतित होना स्वाभाविक है. पाकिस्तान की मौजूदा सरकार को इस विषय में शीघ्र और महत्वपूर्ण कदम उठाने की ज़रुरत है. .... (वो शहर, जो कल थे हरे-भरे : -/४ /डॉ. रंजन ज़ैदी) [जारी........-४]
दूसरी शताब्दी के अन्य शहरों में सरकेब और सरसुख भी निश्चय ही अपने समय के महत्वपूर्ण नगरों में मने जाते रहे होंगे।
खुदाई में मिले सबूतों से इस बात का भी पता चलता है कि तक्षिला में अन्य विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त अंतर्राष्टीय ख्याति का एक विश्वविद्यालय भी रहा था जहाँ संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए देश-विदेश से छात्र यहाँ आया करते थे.
१९८० में यूनेस्को ने तक्षिला को विश्व की बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल कर लिया लेकिन 'ग्लोबल हेरिटेज फंड' की एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान स्थित इस क्षेत्र में निरंतर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले ऐसे अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे है जिनका प्रभाव खुदाई के कार्यों व प्राप्त बहुमूल्य ऐतिहासिक वस्तुओं पर तो पड़ ही रहा है, संग्रहालय में रखी गई वस्तुओं को भी काफी नुकसान पहुँच रहा है. जैसे हाल में ही होने वाले 'सिंध फैस्टिवल' के आयोजन की योजना से ऐतिहासिक खंड़हरों पर फैस्टिवल-मंच का जो निर्माण किया गया है, उससे अंरराष्ट्रीय बिरादरी का चिंतित होना स्वाभाविक है. पाकिस्तान की मौजूदा सरकार को इस विषय में शीघ्र और महत्वपूर्ण कदम उठाने की ज़रुरत है. .... (वो शहर, जो कल थे हरे-भरे : -/४ /डॉ. रंजन ज़ैदी) [जारी........-४]
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