Rishte Asmanon Ke /Dr. Ranjan Zaidi
शादी-ब्याह में तो आपकी पीढ़ी को ऐसी महारत हासिल है कि बस, अल्लाह की पनाह! मानो चांद पर चढ़ाई करनी हो। देख लिया शादी करके! अब मेरी भी करा दो अपनी बहन के मैकेनिक लौंडे के साथ। आराम से सांस लेना और दीवारों से सर फोड़ती रहना, हाँ नहीं तो! 'बेटियां छाती का बोझ होती हैं', बुलाओ मेरी छम्मक-छल्लो ख़ाला को, उसके लौंडे को। अपशगुन हो गया है! क्या हो जायेगा मेरी बाजी को……
पढ़ते-पढ़ते सारा उछल पड़ी।
कांच का एक टुकड़ा उसकी गोद में आकर गिरा था और वह 'हाय अल्ला' कह कर खड़ी हो गई थी। उसने देखा, दो गौरय्याएं एक.दूसरे से गुथी हुई थीं। लड़ते-लड़ते वे दोनों फुर्र से बाहर निकल गई्रं लेकिन जाने से पूर्व उन दोनों ने सारा के कमरे को पूरी तरह से अस्त.व्यस्त कर दिया था। वह गला फाड़ कर चीख उठी 'मम्मी! बा जी का फ़ोटो!'
उस समय सारा की मम्मी रसोई में आटा गूंध रही थीं. सारा की चीख सुनकर बड़बड़ाने लगीं. कम्बखतमारी को छुट्टी में भी चैन नहीं है। इम्तेहान सिर पर हैं और चीख-पुकार देखो। ऊंची आवाज़ में उन्होंने पूछा 'अरे क्या हुआ? क्यों पूरा घर सिर पर उठा रखा है?'
"यह देखिये!" सारा, रसोई घर में ही आ गई। उसके हाथ में टूटा हुआ फ्रेम और बाजी सादिया का वह फोटो था जिसमें वह दुल्हन की शक्ल में पति सरदार अहमद अंसारी के साथ थी। यह फोटो ठीक उस वक़्त का था जब दोनों वर-वधू एक तरफ़ अपने खास लोगों के बीच खाना खाने आये थे। इस फोटो में सादिया बेहद खूबसूरत लग रही थी। सारा के पिता सईद अंसारी अपनी बेगम के अनुरोध पर इसे बाज़ार से फ्रेम करवा लाये थे। सारा ने उसे अपने कमरे की कार्निस पर ही सजा दिया था। चिड़ियों ने उसी फ़ोटो-फ्रेम को फर्श पर गिराकर उसके टुकड़े बिखेर दिये थे। कमरे में हर तरफ़ अब कांच ही कांच बिखरा हुआ था। कैसी अपशगुनी हुई है। बिरादरी के बड़े-बूढ़े कहते हैं कि कांच का टूटना अपशगुन होता है। पीढ़ियों के संस्कारों ने ही तो हमें ऐसी सदियों की विरासतें दी हैं।
श्रीमती सईद अंसारी का दिल दहल उठा, 'हाय अल्ला! मेरी बच्ची सलामत हो। उसे अब किसी और की बुरी नज़र न लगे।' बड़ी बेटी सादिया का खयाल आते ही वह सुबकने लगीं, "अल्ला करे वह खैरियत से हो। मरी, यह खिलंदड़ी तो अपनी इकलौती बहन का फ़ोटो तक नहीं संभाल पाई। अब खड़ी मुंह क्या देख रही है। कमरे में बिखरे हुए कांच के टुकड़ों को झाड़ू से एक तरफ़ कर। कामवाली आने वाली है । उसे पोछा भी लगाना होगा।"
"इतना नाटक क्यों मम्मी!" सारा ने तुनक कर कहा, "जब कालेज जाऊंगी तो वापसी में फोटो पर फ्रेम चढ़वाती लाऊंगी। ये जिहालत की बातें तो आप मेरे सामने किया मत करो कि शीशा टूटेगा तो अपशगुन होगा। अब तक जो होना था हो गया। वह भी आप लोगों की वजह से। जब बाजी पढ़ना चाह रही थीं तो आप लोगों ने ही उन्हें पढ़ने नहीं दिया था, तड़ से एक फ्रॉड के साथ उनकी शादी कर दी थी ।.....?" शादी-ब्याह में तो आपकी पीढ़ी को ऐसी महारत हासिल है कि बस, अल्लाह की पनाह! मानो चांद पर चढ़ाई करनी हो। देख लिया शादी करके! अब मेरी भी करा दो अपनी बहन के मैकेनिक लौंडे के साथ। आराम से सांस लेना और दीवारों से सर फोड़ती रहना, हाँ नहीं तो! 'बेटियां छाती का बोझ होती हैं', बुलाओ मेरी छम्मक-छल्लो ख़ाला को, उसके लौंडे को। अपशगुन हो गया है! क्या हो जायेगा मेरी बाजी को……” कह कर सारा तन्नाती हुई अपने कमरे की तरफ़ लौट गई।
सारा, सादिया बाजी का फोटो बेगम सईद के पास ही छोड़ गई थी ताकि वह अपनी आदत के अनुसार देर तक सेंटी होती रहें। आटा गूंधकर श्रीमती सईद फोटो को अपलक देखने लगीं। देखते-देखते वह सचमुच अत्यंत भावुक हो गई थीं। बेटी का चेहरा आंखों के सामने आ गया था।
ऐसा लगा जैसे सादिया मां की गोद में सिर रखकर बड़े इत्मीनान से लेटी उनके चेहरे को अपलक देख रही है। कितना मासूम लेकिन मायूस चेहरा लग रहा था । मां को बेटी के सीने में हो रही उथल-पुथल का पूरी तरह से अहसास है। वह अभी पढ़ना चाहती है। वह नहीं चाहती कि अभी उसका कहीं रिश्ता तय हो। सईद अंसारी के विचार से बेटी के बालिग़ होते ही उसकी शादी कर देनी चाहिए। वह जिस घर में जायेगी, वहां भी कुछ उसकी अपनी ज़िम्मेदारियां होंगीं। मां-बाप कब तक अपनी बेटी को सहेज कर अपने घर रख सकते हैं। एक दिन तो बेटियों को अपने पीहर जाना ही होता है। यही तो परंपरा है फिर, जल्दी हो या देर। छाती पर पत्थर ही क्यों न रखना पड़े, बेटी को रुखसत करना ही पड़ता है।
चौधरी सलामत हुसैन रिश्ते से साढ़ू हैं। कई बेटे हैैं। बड़ा, मोटर-मैकेनिक है। खूब कमाता है माशाल्लाह। आसिफ़ हुसैन उनका छोटा बेटा है। सादिया के लिए बड़े बेटे का रिश्ता आया था, सईद अंसारी ने मना कर दिया। तब खाला ने सारा को अपने छोटे बेटे के लिए मांग लिया, इस पर 'सारा' चढ़ बैठी थी। चिढ़कर ही सारा ने कह दिया था,"खाला, तुम कर लो! तुम्हें शादी करने का बड़ा शौक़ है....।' इस पर खूब चार-चोट की लड़ाई हुई और एक महीने तक सबका आना-जाना बंद रहा लेकिन जब ख़ाला का सीना भर गया तो खुद ही रोती-कलपती आकर अपनी बहन से ऐसे लिपटीं मानों वह लाश हों और लोग मैय्यत उठाने आ गए हों। समझौता हुआ कि 'छोटे बेटे से सारा को ब्याह देना, हालाँकि वह मेरे बाल नोच डालेगी लेकिन उसे मैंने गोदों खिलाया है। वह दिल की बुरी नहीं है। उसी का रिश्ता कर लो आपा! जिला परिषद् के स्कूल में उर्दू टीचर है। चाल-चलन भी ठीक है। दूल्हा भाई भी उसे पसंद करते हैं, उसपर भरोसा करते हैं कि वह एक अच्छा शौहर साबित होगा। उसे वह बचपन से बढ़ते-पढ़ते देखते रहे हैं।'
लेकिन......घर में फिर भूचाल आ गया था। थमा तब, जब सईद अंसारी ने कहा कि अभी दोनों छोटे हैं, पढ़कर बड़ा होने दो। यह उम्र शादी की नहीं है। सईद अंसारी ने कहा कि वह इस विषय पर अभी फ़िलहाल सोचना नहीं चाहते हैं।
वैसे भी सईद अंसारी इस विषय पर कुछ भी सोचना नहीं चाहते थे। वह अभी विचार-मंथन की प्रक्रिया से गुज़र रहे थे। हाजी सलामत हुसैन का बहुत बड़ा परिवार है। सारी बहुंए संयुक्त परिवार का हिस्सा हैं। किसी की भी कोई पहचान नहीं है। क्या सारा भी उसी समंदर में मिल जायेगी। अभी तो सामने सादिया है, उसकी शादी.....।
दरवाज़े की एक आधी-दस्तक ने सादिया की तक़दीर का रास्ता ही बदल दिया। एक दिन कुछ ऐसा ही तो हुआ था। दरवाजे को पार कर सईद अंसारी अपने एक पुराने दोस्त के साथ घर में दाखिल क्या हुए कि घर में लोबान की खुशबुओं की लपटें उठने लगीं। उस दिन मिस्टर और मिसेज़ सईद अंसारी की खुशी देखते बनती थी। मिस्टर सईद और उनकी बीवी पहले तो आगंतुक को देखकर आश्चर्यचकित रह गए और जब पता चला कि यह कोई पीर-फ़कीर या दरवेश नहीं, यह तो पुराने वक्तों के दोस्त जब्बार भाई हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
वह जब्बार भाई ही थे। 15 वर्षों बाद आज फिर सईद अंसारी के परिवार में उनकी वापसी हुई थी। सईद अंसारी फूले नहीं समा रहे थे। इसके बावजूद श्रीमती सईद धुंध और द्वंद्व में फँसी हुई थीं। अच्छे वक़्त में सब साथ रहे, पर जब बुरे दिन आये तो पीछा छुड़ाकर जब्बार भाई ऐसे ग़ायब हुए मानो गधे के सिर से सींग। दोस्ती थी तो मुहब्बतें भी थीं, ईमानदारी थी तो बरकतें भी थीं। दोनों एक साथ कार्पेट का बिज़नेस किया करते थे। फिर न जाने किस की बुरी नज़र लग गई। लगातार घाटा होने लगा। सादिया के अब्बा का बाज़ार में पैसा ऐसा फंसा कि वह कभी उबर ही नहीं पाये लेकिन जब्बार भाई ने हौसला नहीं खेाया। तड़ से साझे की हांडी फोड़ अलग हो गये। अलग हो जाने के बाद वह 15 वर्षों तक न तो कभी बाज़ार में दिखाई दिये और न ही कहीं मिलनसारों में। आज इतने वर्षों बाद फिर........!
उनके आने से घर-भर में चहल-पहल सी मच गई थी। बैठते ही उन्होंने कलाई की घड़ी उतार कर अपने दोस्त सईद अंसारी की कलाई में बांध दी, "इनकार मत करना। यह मेरी कमाई नहीं है। मैं इतनी महंगी घड़ी तुम्हें देने के क़ाबिल कभी हुआ ही नहीं। तुम्हारे भतीजे सरदार हुसैन ने दुबई से मुझे भेजी थी। पूरे अट्ठारह हज़ार की है। उनकी कमाई पर तुम्हारा भी तो पूरा हक बनता है। तुमने और भाभी ने उन्हें गोदों खिलाया है। देखो!''
जब्बार भाई ने अपने पुत्र सरदार हुसैन का फोटो सामने रखते हुए कहा कि "यह हैं 15 साल बाद के सरदार ग़ुलाम हुसैन! माशाल्लाह खुद दो बार हज कर चुके हैं। अब ज़िद है कि हम दोनों मियाँ-बीवी को वह हज कराएं। करेंगे इंशाल्लाह! लेकिन अब हम तुम लोगों के साथ हज्जे-बैतुल्लाह करेंगे, बेटे सरदार हुसैन अंसारी कि शादी के बाद। इन दिनों वह स्टेट्स में हैं। यानि अमेरिका में। वैसे, वह इंटरनेशनल रेड-कार्पेट इंडिया लि. के सीईओ हैं। उनके ओहदे और हमारे बिज़नेस ने आज हमारी हैसियत पहले से हजार गुना बढ़ा दी है। अब तुम्हें भी हम एक्सपोर्ट का लाइसेंस दिलाने की कोशिश करेंगे...। अल्ला का शुक्र है, उसने क्या कुछ नहीं दिया, सिवा बेटी के। अब कमी है तो घर में एक बहू की, जो बेटी बनकर रहे। अल्ला ने चाहा तो अब वह भी आजायेगी।"
यहीं पर सादिया की तकदीर ने एक नये मकान के दरवाज़े पर आधी दस्तक दे दी। जब्बार भाई ने पूछा, 'तुम्हारी भी तो एक बेटी थी, जिसे मैंने भी गोदों खिलाया है। कहां है वह? बुलाओ न उसे! अब तो वह भी बड़ी हो गयी होंगी? जवाब में सईद अंसारी ने सफ़ाई देते हुए कहा,'एक नहीं, दो कहो! एक तुम्हारे सामने थी तो दूसरी तम्हारे बाद पैदा हुई। बुलाता हूं। सादिया इसी लम्हे चाय की ट्रे लेकर आती हुई दिखाई दी।
"सलाम अलैकुम"
"व-अलैकुमअस्सलाम!" मेहमान सादिया को देखकर हतप्रभ रह गए. सादिया सिर पर दुपट्टे के आंचल को संवारने लगी। सईद अंसारी ने कहा, "यह है वो सादिया जिसे तुमने गोद में खिलाया है, बड़ी बेटी। छोटी का नाम 'सारा' है, बहुत पढ़ती है, चटर-पटर भी खूब करती है। इन दोनों बच्चियों के अलावा मेरी नई नस्ल में और भी बच्चियां हैं जो पढ़-लिखकर नौकरियां कर रही हैं। तुम जानते हों, हमारी बिरदारी में मुझ समेत किसी को भी पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी। कितने ही लोग पाकिस्तान चले गए लेकिन हम मायूस नहीं हैं। हमारे पास दौलत न हो, पर हमारे बच्चों के पास इल्म की दौलत ज़रूर है हमारी बच्चियां पढ़ रही हैं। बच्चियां ज़िद किये बैठी हैं कि सिविल सर्विसेज़ के एक्ज़ाम में बैठेंगीं। अब ज़रा साचो.......।'
'आओ....बैठो मेरे पास!" जब्बार भाई की तो सादिया के चेहरे से नज़र ही नहीं हट रही थी। उन्होंने कहा, "आपका चचा हूं! यही तो आप मुझे कहा करती थीं।" उन्होंने पर्स से हज़ार-हज़ार के दो नोट निकालकर सादिया की हथेली पर रख दिये। कहा,एक आपका और दूसरा आपकी छोटी बहन चटर-पटर सारा का। खुश रहिए, जाइये! अल्लाह सलामत रखे!" सुनकर सब हंस पड़ते हैं।
सादिया उठकर चली गई तो मिसेज़ सईद धुली-धुलाई सी आकर अपने मियाँ के पास बैठ गईं। पूछा, 'लंच में आप क्या लेंगे भाई साहब? जब्बार भाई को मज़ाक़ सूझा,"क्या बात है! भाभी.....लगता है मानो एकदम वाशिंग-मशीन से धुलकर चली आ रही हैं आप और खाने को लंच, कमाल है! है न मियां सद्दू? भाभी अभी भी पहले ही जैसी हैं माशाल्लाह! बड़ा ख्याल रखते हो करघे का....।"
सुनकर श्रीमती सईद कुछ झेंप सी गयीं लेकिन जवाब देने में उन्होंने भी देर नहीं की,"ज़्यादा तारीफ़ मत कीजियेगा, नहीं तो आपके दोस्त के पास से किसी चीज़ के जलने की बू आने लगेगी।" ठहाकों के बीच सईद अंसारी ने कहा,"दो मौलवियों के बीच मुझ बेचारे मुर्गे को क्यों फंसा रहे हो भाई?"
जब्बार ने मुस्कुराते हुए कुछ क्षणोपरांत झुककर अपने ब्रीफ़केस से हीरे की एक अंगूठी निकाली और श्रीमती सईद की ओर बढ़ा दी, कहा, "बड़े बुज़ुर्ग सही कहा करते थे कि रिश्ते ज़मीन पर नहीं, आसमानों में तय हो जाते हैं। सरदार की मां ने कहा था कि हीरे की एक अंगूठी लाकर रख लीजिये और खुदा का करना देखिये, वही खरीदकर लाईं भी थीं।उनका कहा सही निकल आया। उन्होंने कहा था, 'रिश्ते तो कभी भी और कहीं भी तय हो सकते हैं। कुदरत का यह करिश्मा ही तो है कि जहां कभी कुछ भी नहीं था, वहां आज अंगूठी भी हीरे की है और रिश्ता भी।" अत्यंत सधे और गम्भीर स्वर में जब्बार ने कहा," 'भाभी! अगर आप दोनों इनकार न करें तो आज से सादिया मेरी हुई और यह अंगूठी मेरी बहू की।"
कानों को विश्वास नहीं हुआ। आने वाले इस प्रस्ताव को सुनकर सईद और मिसेज़ सईद स्तब्ध रह गए।
बेटे का जो फोटो जब्बार छोड़ गये थे, उसे सादिया की मां ने बहुत देर तक देखा था। बेटी को भी दिखाया। बेटी ने वही रटे-रटाये शब्द दोहराये कि उसे अभी पढ़ना है लेकिन जब उसने तन्हाई में कमरे के दरवाजे़ बंद कर आईने के सामने फोटो को देखा तो नाटकीय मुद्रा में कहा, 'ठीक तो है, शक्ल भी बुरी नहीं! क्यों मेरे होने वाले रईस मियाँ? ग़रीब बेटी से निभ जाएगी? इसके साथ ही वह कमरे में खुद-ब खुद नाचते हुए ज़ोर से हंस पड़ी थी।
बेटे का जो फोटो जब्बार छोड़ गये थे, उसे सादिया की मां ने बहुत देर तक देखा था। बेटी को भी दिखाया। बेटी ने वही रटे-रटाये शब्द दोहराये कि उसे अभी पढ़ना है लेकिन जब उसने तन्हाई में कमरे के दरवाजे़ बंद कर आईने के सामने फोटो को देखा तो नाटकीय मुद्रा में कहा, 'ठीक तो है, शक्ल भी बुरी नहीं! क्यों मेरे होने वाले रईस मियाँ? ग़रीब बेटी से निभ जाएगी? इसके साथ ही वह कमरे में खुद-ब खुद नाचते हुए ज़ोर से हंस पड़ी थी।
वाराणसी के बाहर नये शहर में जब्बार भाई की कोठी के बड़े से गेट में प्रवेश करते ही श्री और श्रीमती सईद की टांगें कांपने लगीं। उन्होंने ऐसी कल्पना तक नहीं की थी कि उनकी बेटी जिस मकान में बहू बनकर प्रवेश करेगी, वह इतनी भव्य होगी कि आंखें तक चौंधिया जाएं। सादिया क्या सचमुच इतनी बड़ी किस्मत लेकर आई है? महलों की रानी! लचके-गोटे और कढ़े कीमती खड़े पाजामे में ज़ेवरों से लदी सादिया कोठी के इकलौते वारिस की मालकिन बनने वाली है। ज़रूर यह उन कुछ नेकियों का सिला लगता है, जो उनके द्वारा गाहे-बगाहे होती रही होंगीं।
बहुत देर बाद श्रीमती और श्री सईद खां ने जब्बार भाई की दुनियावी नुमाइश से उबर कर वास्तविकता के कालीन पर अपने कदम रखे। आज जब्बार की हैसियत दोस्ती से ऊपर उठ गई थी। सईद, जब्बार अंसारी के सामने बौने लगने लगे थे। जब्बार भाई तो आज बहुत बड़े आदमी बन चुके हैं लेकिन बेटी ने अपने पिता सईद अंसारी को भी छोटा नहीं रहने दिया। इस घर की बहू बनकर उसने उनके क़द को और भी क़द्दावर बना दिया था। कौन कहता है कि बेटियां अपने खानदान की बद्दुआ होती हैं। आज सईद अंसारी बड़े फ़ख्र से कह सकते हैं कि बेटियां खुदा की नेमत होती हैं। बेटी न हो तो बहू बनकर अपने नूर से इस कोठी को कौन जगमगायेगा?
जब्बार भाई का दिल भी बहुत बड़ा था। पहले कभी इसका अहसास ही नहीं हुआ। उन्होंने सईद दम्पत्ति की ऐसी आवभगत की कि देखते बनता था। जैसे जब्बार वैसी ही उनकी पत्नी दरियादिल। यही तो है आसमानों में तय हुआ रिश्ता। जिस्म दो, आत्मा एक। जब्बार भाई की बीवी, बीबी राबिया ने अपनी बहू के सारे कीमती गहने सामने फैला दिये। एक से बढ़ कर एक। एक तो गले का हार ऐसा कि मिसेज़ जब्बार ने आईने के सामने अपने ही गले में डाल लिया। राबिया ने कहा, 'उतारना नहीं भाभी, तुम्हें मेरी क़सम! बोझ लगेे तो मेरी तरफ़ से 'सारा' को दे देना। वह भी तो मेरी बच्ची है।'
शाम के ब्रेकफ़ास्ट का प्रबंध लॉन में किया गया था। वहीं जब्बार ने अपना दिल खोल कर रख दिया। शादी हम जल्दी करना चाहते हैं। रिश्तेदारों और दौलतमंद जानकारों के कुनबों का हम पर बहुत दबाव है। हमें अल्ला ने सब कुछ दिया है। अब तो बस दुआओं की ही ज़रूरत है। एक जोड़े में ही सादिया को रुख्सत कर दो भाभी । हमें और कुछ नहीं चाहिए।" पति के सुर में अपना सुर जोड़ती हुई मिसेज़ राबिया ने कहा,"और क्या! जिसने बेटी देदी, उसने सारी दौलत दे दी। सादिया कोई गैर भी तो नहीं। आंखों के सामने की पैदा हुई औलाद है। वह बहू नहीं, इस घर की बेटी है भाभी।"
रात देर तक मिसेज़ और मिस्टर सईद अंसारी कोठी के शानदार शयनकक्ष में लेटे चिंताओं में डूबे रहे। सईद जल्दी चाहते हैं। हमें भी देरी नहीं करनी चाहिए। इतने बड़े घर पर किसकी नज़र नहीं होगी। एक से एक मालदार लोग। हम तो कहीं ठहरते भी नहीं हैं। ये तो सईद और भाभी की मुहब्बत है कि उन्होंने सादिया को देखते ही कुबूल कर लिया। सादिया इस घर में कितना खुश रहेगी।
नर्म और मंहगे बिस्तर पर दोनों पति-पत्नी को नींद नहीं आ रही थी। सामने दीवार पर एक कद्देआदम तस्वीर टंगी थी जिसमें सरदार हुसैन कुर्सियों पर बैठे अपने माता-पिता के बीच में खड़े थे। लम्बा और गठा हुआ शरीर, आकर्षक व्यक्तित्व और किताबी चेहरे पर स्वप्निल आंखें। सादिया कितना खुश रहेगी अपने मियाँ के साथ। अल्लाह ने कितनी खूबसूरत जोड़ी बनाई है।
द्वंद्व कीे गाढ़ी धुंध से सईद दम्पत्ति को निकलने में काफ़ी समय लगा। अंततः दोनों इस फ़ैसले पर सहमत हो गये कि वे शादी में विलम्ब नहीं आने देंगे। हालांकि इस निर्णय तक पहुंचना आसान नहीं था, लेकिन अब वे पीछे नहीं लौट सकते थे। उन्हें यहां से जल्द से जल्द स्थित अपने घर आरा पहुंचकर शादी की तैयारियों में जुट जाना होगा। कुछ भी न हो तो भी बेटी की शादी में कुछ न कुछ तो करना ही होगा। पिंडाल हो या खाने-पीने का प्रबंध। कोई काम आसान नहीं है। देखना होगा कि सादिया के बैंक-खाते में अब तक कितना पैसा जमा हो चुका है क्योंकि अभी कुछ वक़्त पहले ही एक पालिसी भी मिच्योर हुई थी। अल्ला ने चाहा तो किसी के आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे। इसी सुकून ने दोनों को अंततः नींद की लोरियों से भरी गोद में समेट लिया।
सईद अंसारी, शादी की तैयारियों में जुट गये। चूंकि शादी जल्दी होनी थी, इसलिए आस-पास के मुहल्लों में बसी बिरादरी के कुछ बड़े.-बूढ़ों को भी बुला लिया गया। कुछ रिश्तेदार महिलाएं और युवा भी मदद को आ पहुंचे। व्यस्तताएं बढ़ती जा रही थीं। घर और मुहल्ले में काफ़ी चहल-पहल हो गई थी। घर के सामने लगी सड़क को सजाने और संवारने का काम भी शुरू किया जा चुका था। पहली बार इतनी बड़ी ख़ुशी जो थी। अब बस, शादी की तारीख का इंतज़ार था।
परम्परा से बिरादरी के बीच एक मिथक चलता आ रहा था कि सगाई बिरादरी में कभी रास नहीं आती। इसलिए सगाई की जगह सीधे शादी को ही सही ठहराया गया। अच्छे दिन-तारीख के सुझााव भी वाट्स-ऐप और वीडियो के रास्ते तय कर दिए गये। सारा ने तो अपने आईडी से मेल भी कर दिया। उसे तो अपने होने वाले दूल्हाभाई का आईडी पता नहीं था, नही तो अब तक सीधे सम्पर्क भी बना चुकी होती। हांलाकि उसने अपने होने वाले 'नौशा भाई' के नाम को फ़ेसबुक के सर्च में डाल रखा था लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया था। जवाब आया तो बनारस से। कोरियर से आये संदेश में लिखा था, 'हम सब अचानक एक नई मुसीबत का शिकार हो चुके हैं। सरदार बेटे के आने का हम सबको बेचैनी से इंतजार था लेकिन साउथ अफ्रीका में होने वाले किसी समिट में उन्हें शरीक होने के लिए अब जाना होगा। उसकी तैयारी भी करनी है। फ़िलहाल सरदार मियाँ के हिन्दुस्तान में लौटने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं है। ऐसे में मौलवियों का तड़ से एक मशविरा आ गया कि सरदार और सादिया का वीडियो पर सीधे निकाह किया जा सकता है। मुझे तो इस पर कोई एतराज़ नहीं है। तुम अपनी राय हमें फ़ौरन वीडियो फ़ोन पर ही दो ताकि हम अगला कदम उठा सकें।"
विवाद तब समाप्त हुआ जब खबर आई कि सरदार के कार्यक्रमों में हुई नई तब्दीली के अंतर्गत वह विवाह की निर्धारित तिथि से पूर्व भारत पहुंच रहा है और निकाह सबकी उपस्थिति में ही होगा। इस सूचना ने न केवल शंकाएं ही दूर कर दीं बल्कि सारे सवालों को ही ठंडे बस्ते में लपेट कर रख दिया।
जब सदार अपने मुल्क लौटा तो उसके घर मानों बहार सी आ गई। शहनाइयों की गूंज ने जवान दिलों की धड़कनों को तेज़ कर दिया। शादी के दौरान सादिया ने अपने होने वाले पति को देखा तो देखती ही रह गई। ऐसा खूबसूरत मर्द तो वह फ़िल्मों में ही देखती रही है। शौहर के रूप में पाकर वह अपनी किस्मत पर फ़ख्र करने लगी। उसकी शादी संपन्न हो गयी।
15 दिन कैसे निकल गये, कुछ पता ही नहीं चला। इनमें कई दिन तो ऐसे भी थे जिनमें सरदार अंसारी ने सादिया को अलग होने की मोहलत ही नहीं दी। इसी दौरान उसने बताया कि वह शीघ्र अमेरिकी नागरिक बनने वाला है और एक जज़ीरे में जो ज़मीन उसने खरीदी है, उस पर वह अपने सपनों का एक ऐसा आधुनिक डिजा़ाइन वाला मकान बनवाएंगे, जिसमें, 'तुम्हारे बच्चों की किलकारियां गूंजेंगीं। एक वक्त आयेगा जब तुम वहां रह कर मुझे भी भूल जाओगी।' अपनी नई और सपनों जैसी रंगीन दुनिया में सादिया सचमुच इतना डूब गई थी कि उसे कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। उसकी गाढ़ी और नशीली नींद तब उचाट हुई जब सरदार अंसारी के अमेरिका लौटने की तारीख ठीक सामने आ पहुंची और श्रीमती व श्री जब्बार अंसारी की आंखों में आंसू छलक आये।
समय गतिवान है। कब, किसके रुकने से रुका है। समय ने सरदार और सादिया को पहली बार मिलकर भी जुदा कर दिया था। सादिया के पास बस ढेर सारी यादें बाक़ी रह गईं थीं, ढेर से सपने, जिन्हें अभी साकार होना था ढेर सारी योजनाएं जिन्हें वह अमेरिका जाकर पूरी करने का इरादा रखे हुए थी लेकिन अब, ऐसा विचार आते ही उदासियों के स्याह पंखों ने उसका चेहरा ढक लिया। कोई भी उसकी आंखों में उबलते रहने वाले आंसुओं को नहीं देख सकता था। सपनों में तो उसने अनेक बार यह भी देखा था कि वह ढेरों-ढेर किताबों के बीच बैठ कर पढ़ती रहती है। वह बड़ी-बड़ी लड़कियों और लड़कों के क्लास लेती रहती है। वह एक सफल अध्यापिका है और कई अध्यापकों के बीच अकसर विभिन्न विषयों पर उसकी बहसें होती रहती हैं। वह महामहिम राष्ट्रपति से उनके भवन में एक कुशल और आदर्श अध्यापिका का पुरस्कार ग्रहण कर रही है। ऐसे ही स्वप्न उसे आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा और शक्ति प्रदान करते रहे थे। उसे उम्मीद थी कि एक दिन उसके इरादों को ज़रूर मंज़िल मिलेगी।
उम्मीद ही तो उसकी ताकत है। उसने अपने खालीपन को भरने के लिए फिर से किताबें उठा लीं। वह अपनी पढ़ाई फिर से जारी रख सकती है। उसे याद आया, उसके पति सरदार हुसैन ने कहा था कि अब उसकी सादिया अपने सपनों को किसी भी मुल्क में रहकर उन्हें हकीकत में बदल सकती है। ऐसे विचारों ने सादिया में एक खास किस्म के आत्मविश्वास को भर दिया था। इसी आत्मविश्वास ने उसे संभाला और वह अपनी तन्हाई और उदासी से उबर कर एक शक्तिशाली औरत बनकर फिर से उठ खड़ी हुई।
वह अब अपने पति को फ़ोन नहीं करती थी और न ही वीडियो-कॉल क्योंकि उसे जवाब आंसरिंग मशीन देती थी। लैप-टॉप अब नोट्स बनाने और विभिन्न प्रोजेक्ट तैयार करने के काम आ रहा था। अब उसकी खुद्दारी रफ्ता-रफ्ता जग रही थी लेकिन सरदार हुसैन मानो अपना रास्ता ही भूल चुका था। 'नो रिप्लाई!'
वह इस खबर से खुश थी कि बा-जी ने अपनी पढ़ाई को जारी रखा है और अब वह सिविल सर्विस की तैयारी में जुटी हैं। काश! सबको ऐसी सहयोग देने वाली ससुराल मिले और और सास-ससुर भी,जो बहुओं को बेटियों का-सा दर्जा दे देते हैं।
वाराणसी के स्टेशन पर पहुंचकर सईद परिवार को ड्राईवर से पता चला कि उन्हें बहू बेगम स्वयं लेने आई हैं। यह ऐसी खुशी थी कि सारा किसी बच्चे की तरह उछल पड़ी। स्वयं सादिया अपने माता-पिता और बहन को पाकर फूली नहीं समा रही थी। पहुंचकर पता चला कि सादिया तो बहुत खुश हैं और पढाई में लगी रहती हैं। सास-ससुर बिछे-बिछे रहते दोनों की खुशियां छुपाय नहीं छुप नहीं रही थीं ।
हाजी जब्बार अंसारी ने तो सईद के आने की खुशी में एक छोटी-मोटी पार्टी तक का आयोजन कर दिया था जिसमें शहर के कई बड़े घरानों के लोगों ने भी भाग लिया था। यहीं पर फिर कुछ ऐसा हुआ कि एक न दिखाई देने वाला तूफ़ान न जाने किधर से आया और उसने सादिया के रेतीले महल को समंदर की एक बड़ी लहर के साथ धाराशाई कर उसके निशान तक को मिटा दिया।
हुआ यूं कि श्रीमती मालवीय जो कालीन उद्योग के जाने.माने व्यक्ति पीपी पांडे की बेटी और घटानंद मालवीय की पत्नी थीं, सादिया से मिलकर चौंक उठीं। 'तुम.....?"
श्रीमती जब्बार अंसारी की ओर मुड़कर उन्होंने पूछा,"ऐसा कैसे? क्या सरदार ने दूसरी शादी कर ली है?"
यह एक ऐसा तूफ़ान था जिसकी दहाड़ ने समूची पार्टी को दहलाकर रख दिया। पार्टी के चेहरे पथराते चले गये। रफ़ता-रफ़ता समूची पार्टी का वह केंद्र बन गई थीं। घटानंद मालवीय ने अपनी पत्नी को घूरकर देखा,"यह क्या बकवास है? अपनी आदत से तुम नहीं चूकतीं।"
तड़क कर श्रीमती मालवीय ने जवाब दिया कि उन्होंने ऐसा क्या पूछ लिया? क्या वह नहीं जानते कि दुबई में वे कालीन के बड़े व्यापारी शेख सलाम बिन सलाह की बेटी साबिरा शेख को अपने यहां कितनी बार डिनर पर बुला चुके हैं जो अब सरदार अंसारी के एक बच्चे की मां भी है। क्या वह नहीं जानते कि शारजा में जब सरदार के विवाह पर पार्टी का आयोजन हुआ था तो उसमें वे विशेष अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए थे? आप ये सब क्यों छुपा रहे हैं?"
घटानंद मालवीय एकाएक घबरा गए थे उन्होंने अपनी पत्नी के कान में चुपके से कहा, "मुसलमानों में चार शादियां होती ही रहती हैं, कर लिया होगा!'
"लेकिन शायद मिसेज़ सईद अंसारी इस राज़ को नहीं जानती हैं, उन्हें बताना चाहिए था। मिसेज़ सईद......क्या आप जानती है कि....
इस तड़कती बिजली ने पथराये रिश्तों को भी जलाकर राख कर दिया। सादिया अपने कमरे में जाकर वाशरूम में उल्टियों पर उल्टियां करने लगी थी। सारा और उसकी मां उसके पीछे.पीछे दौड़कर वाशरूम में पहुंचकर उसकी पीठ सहलाने लगीं। दोनों की सुबकियां थमने का नाम नहीं ले रही थीं। अल्ला! तूने यह कैसा इंतकाम लिया है! यह कैसी सज़ा दी है तूने। कितना बड़ा धेाखा दिया है जब्बार मियां के परिवार ने। दोस्ती की आड़ में फिर खंजर भोंक दिया!
कमरे में और स्त्रियां भी आ गईं। निढाल सी सादिया को बिस्तर पर लिटाकर एसी आन कर दिया गया। किसी ने फ़ोन कर डाक्टर को भी बुलवा लिया। रफ़ता-रफ़ता कमरा लोगों के जमावड़े से भर गया था। कमरे के बहुत पास से जब्बार दम्पति की सफ़ाई देती आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। वे दोनों कसमें खा-खाकर सफ़ाई दे रहे थे कि उन्हें इसका बिल्कुल भी इल्म नहीं है कि उनके बेटे ने दुबई में पहले से शादी कर रखी है। उसने तो कभी बताया भी नहीं कि वह एक बच्चे का बाप भी है। श्रीमती जब्बार तो फूट.फूट कर रो रही थीं। उन्हें क्या खबर कि उनकी कोख एक दिन उनके खानदान की इज़्जत मिट्टी में मिला देगी। सरदार हुसैन अगर अपनी मां को ही बता देता तो वह यह रिश्ता कभी न करती। सादिया उनकी बच्ची की तरह है। उसे उन्होंने बचपन में गोदों खिलाया है। वह उसकी ज़िन्दगी से नहीं खेल सकती थीं।
घर भर में मौत का सा सन्नाटा छा चुका था। सबकी आखों में आंसू और गाढ़ी उदासी के बादल छाये हुए थे। सादिया सदमे में थी। उसे सारा और श्रीमती सईद घेर कर बैठी हुई थीं। सईद अंसारी हथेलियों के हाले में सिर फंसाये गुज़र गये तूफान के बाद के विनाश की संभावनाओं पर चिंतामग्न थे कि अब क्या होगा? कितनी बड़ी भूल हो गई उनसे। बेटी पढ़ना चाहती थी और उन्होंने उसका जीवन ही दोज़ख़ बनाकर रख दिया। सरदार मियाँ ने उन्हें ही नहीं, अपने मां-बाप को भी धोखा दिया है। दोनों कितने दुःखी और शर्मिंदा हैं। अल्ला ऐसी औलाद से तो बेऔलादी ही सही। शुक्र है मालिक का कि उसने दो बेटियां ही दीं। कोई बेटा नहीं दिया। अगर वह होता और भरी महफ़िल और खानदान में उसकी वजह से सईद की तरह उन्हें भी शर्मिंदा होना पड़ता तो?
"मम्मी!" सारा की चीख ने श्रीमती सईद को एक बार फिर दहलाकर रख दिया, "जल्दी!" वह बड़बड़ाने लगीं। इस लड़की का ब्याह होना चाहिए था जिसने घरभर को सिर पर उठा रखा है। कम्बखत एक पल सुकून से नहीं लेटने-बैठने देती। कितना तेज़ टीवी कर रखा है। सादिया को जितना सुकून पसंद था, ठीक इसके उलट है यह सारा की बच्ची। पता नहीं अब क्या तोड़ा है। पहले शीशा तोड़ा और अपशगुनी की, अब......अल्ला मेरी बच्ची खैरियत से हो। कड़ी मेहनत और पढ़ाई की लगन ने उसे बीमार न कर दिया हो। अल्ला उसे कामियाबी दे। सादी (सादिया) के अब्बू ने बनारस पहुंचकर भी एक फ़ोन तक नहीं किया। आज सारा से कहूंगी कि बहन को फ़ोन कर उसकी खैरियत पूछे।
सारा की चीख ने श्रीमती सईद के पांव फुला दिये। वह कमरे की चौखट पर पहुंची ही थीं कि सारा कूदकर मां के गले में झूल कर नाचने लगी, "अम्मी"! श्रीमती सईद एकाएक बौखला गईं, 'मरी! हुआ क्या?" सारा ने नाटकीय मुद्रा में टीवी की ओर इंगित कर कहा, "खुद ही देख लो। देखो.....देखो! अपनी बेटी को देखो। देखो उसने क्या करिश्मा कर दिखाया है। उसने टाप वन रैंकिंग पाई है आइएएस में। कुछ समझ में आया माताश्री?"
टीवी स्क्रीन पर सादिया पत्रकारों के सवालों के जबाब दे रही थी। श्रीमती सईद को लगा मानो वह कोई स्वप्न देख रही हैं। एक असंभव का संभव दृश्य। कानों में सादिया की ही आवाज़ आ रहीथी। मैं इसका श्रेय श्रीमती और श्री जब्बार साहब को देती हूं जिन्होंने मेरे बिखरे वजूद को अपनी मुहब्बत और वात्सल्य की सरेस से सहेजकर मुझे फिर से एक सशक्त नारी के रूप खड़ा किया और प्रेरित किया कि मेैं न केवल अपने अधिकार की लड़ाई लड़ूं बल्कि उनके आशाीर्वाद और दुआओं से इस लड़ाई में विजय भी प्राप्त करूं। सही मानो में यह विजय मेरे जनक मम्मी-पापा, मेरी बहन सारा और मेरे पालक श्री सत्तार दम्पति के आशीर्वाद और उनकी मुहब्बत का ही नतीजा है।"
"हाय मेरी मम्मी कितनी सेंटी हो गईं।" साड़ी के पल्लू से श्रीमती सईद को अपने आंसू पोछते देख सारा ने छेड़ा तो वह एकाएक भरभराकर रो पड़ीं। सारा ने पास में आकर कहा, "जानती हूं कि बाजी ने कितने दुःख झेले हैं। कितनी बार टूटी हैं, पर यह भी देखिये कि वह कभी हारी नहीं। वह टूटने के बाद भी अपने मायके नहीं आईं।" टीवी स्क्रीन पर सईद को देखकर सारा चीखी, "देखो! अब्बू कुछ कह रहे हैं..."मुझे अपनी बेटी की इस कामियाबी पर नाज़ है। मुझे जब्बार भाई और भाभी पर भी फ़ख़्र है कि उन्होंने अपनी बहू को बेटी का दरजा दिया और बेटे के ज़रिये दिये गये जोे घाव उन्होंने सहे, वे आसान नहीं थे। हम सभी उन ज़ख्मों से आज तक आहत हैं। ऐसे हालात में एक बड़ा फैसला करना मामूली बात नहीं थी। मेरी बेटी ने दोनों घरों के रिश्तों को जो आसमानी फैलाव दिया है,पीढ़ियों तक उसे याद किया जाता रहेगा।"
सारा ने टिप्पणी की, "यार, अब्बू को तो प्रोफ़ेसर होना चाहिए था। क्या इंटलैक्चुअल भाषण की गुगली फेंकी है स्क्रीन पर। वावु!" कैमरा सत्तार पर आ गया था। मुझे मेरे बेटे ने ही अंधेरे में रखा। मैं आज भी और अभी तक सदमे में हूं। मेरी बहू जो इस घर की अगली विरासत को बढ़ाने आई थी, उसे उसने धोखा दिया। मैं सदमे में हूं। मैं सदमे में रह कर भी अपनी बहू को उसके पैरों पर खड़ा होते देखना चाहता था। मैं उसे बेटी का दरजा देना चाहता था और मुझे खुशी है कि अब वह मेरी बेटी है। उसकी कामियाबी पर मैं फ़ख्र करते हुए मुबारकबाद देता हूं।"
इसी समय से फ़ोन आने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह घंटों तक खत्म नहीं हुआ। पहला फोन सईद का था, फिर सादिया का। फिर जानकारों के फोन आने लगे।
मीडिया से भी फोन आये। सारा प्रसन्नतावश फूली नहीं समा रही थी। वह तुरंत उड़कर अपनी बहन को गले लगाना चाहती थी। श्रीमती सईद ने तो कालोनी में लड्डू तक बटवा दिये थे। जानकारों और रिश्तेदारों का आना-जाना अभी भी लगा हुआ था। कुछ रिश्तेदार तो बनारस चलकर सादिया को मुबारकबाद देने के उद्देश्य से टिकट भी बुक करा लाये थे। इनमें सारा और उसकी मम्मी का भी टिकट शामिल था।
उधर, सादिया को मोबाईल पर आये एक फ़ोन नेे कुछ क्षणों तक स्तब्ध किये रखा। फिर उसने तमाम कठिनाइयों को पार कर खुद को सहेजते हुए पूछा, "फरमाइए!" जवाब में मुबारकबाद देते हुए कहा गया कि उसके दिल में सादिया आज भी बसी हुई है लेकिन वह खुद हालात के आगे मजबूर है। उसने बताया कि उसकी वर्तमान पत्नी कैंसर की पेशेंट है और वह उसे इस हालत में अकेला नहीं छोड़ सकता। सादिया चाहे तो निकाह के बंधन से खुद को आज़ाद कर सकती है।
सादिया मोबाईल लिए देर तक मूर्तिवत बैठी कार्निैस पर रखे अपने और सरदार के फोटो को देखती रही। फिर एक गहरी सांस छोड़ कर वह उठी और उसने फ्रेम से फ़ोटो को निकाल लिया। देर तक उसे दखते रहने के बाद उसने फ़ोटो को फाड़ कर उसके टुकड़े हवा में उछाल दिये।
अब सादिया के चेहरे पर किसी भी प्रकार का कैसा भी तनाव बाक़ी नहीं रहा था।
https://samagravicharmanch2017.blogspot.com/2023/12/rishte-asmanon-ke-dr-ranjan-zaidi.html
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