ईरान के लिए भारतीय दोस्ती का बदला देने का समय/RNI
ईरान की राजनीति में उदारवादी आयतुल्लाह हसन रूहानी की जीत और इसके फलस्वरूप विश्व के छह शक्तिशाली देशों के साथ
ईरान की सकारात्मक बातचीत के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा है कि ईरान का खराब समय अब गुजर चुका है जिसके परिणामस्वरूप उसपर लगे प्रतिबंध अब आहिस्ता आहिस्ता हटा लिए जाएंगे। ईरान से संबंधित नवीन हालात की रौशनी में उसके लिए प्रमुख नीतिगत चुनौती पश्चिम और उसके अपने पड़ौसियों के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाना और अपने अकेलेपन से बाहर निकलना है। पर ईरान के लिए इससे भी बड़ी नीतिगत चुनौती भारत जैसे देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाना है जो प्रतिबंधों की अवधि के दौरान उसके संग खड़े रहे।
ईरान की सकारात्मक बातचीत के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा है कि ईरान का खराब समय अब गुजर चुका है जिसके परिणामस्वरूप उसपर लगे प्रतिबंध अब आहिस्ता आहिस्ता हटा लिए जाएंगे। ईरान से संबंधित नवीन हालात की रौशनी में उसके लिए प्रमुख नीतिगत चुनौती पश्चिम और उसके अपने पड़ौसियों के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाना और अपने अकेलेपन से बाहर निकलना है। पर ईरान के लिए इससे भी बड़ी नीतिगत चुनौती भारत जैसे देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाना है जो प्रतिबंधों की अवधि के दौरान उसके संग खड़े रहे।
ईरान पर लगे प्रतिबंधों के दौरान जब वह सारी दुनिया से अलग थलग पड़ा हुआ था उसे भारत का समर्थन पहले की तरह मिलता रहा जिसके फलस्वरूप ईरान से खरीदे जाने वाले तेल का बड़ा प्रतिशत बेरोकटोक भारत पहुंचता रहा। ऐसे समय में जब प्रतिबंधों के चलते डालर में तेल की कीमत अदा कर पाना असंभव था, भारत ने एक विशेष पहल करते हुए यूनियन बैंक आफ इंडिया में खाता खोलकर रूप्ये में तेल की कीमत अदा करना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है। ईरान के खिलाफ विश्व की बड़ी ताकतों की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारत की ओर से चावल और अन्य आवश्यक वस्तुओं जैसे दवाईयों का व्यापार जारी रहा जो संयुक्त राज्य अमरीका, इसराइल और जीसीसी देश जिन में प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति सऊदी अरब भी शामिल है, की झुंझलाहट का कारण बनी।
कड़वी सच्चाई यह है कि अधिकांश मुस्लिम देशों ने परेशानी के समय ईरान को अकेला छोड़ दिया। इस का प्रमुख कारण जीसीसी देशों के साथ वह अनेक मतभेद थे जो समय के साथ अधिक जटिल और विवादास्पद बनते गए। इसका समाधान, यदि कोई है, तो वह तभी निकल सकता है जब ईरान अपनी क्षेत्रीय विदेश नीति में बड़े परिवर्तन करे, जो निकट भविष्य में होता दिखाई नहीं दे रहा। परमाणु विवाद, जीसीसी देशों में शिया आबादी के साथ ईरान के सम्बंध की समस्या, संयुक्त अरब अमारात के साथ तीन द्वीपों अबू मूसा, ग्रेटर तंब और लैसर तंब का मुद्दा और क्षेत्र में बड़े राजनीतिक और रणनीतिक उद्देश्यों के चलते बड़े पैमाने पर राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयासों और जीसीसी देशों के संग विश्वास पैदा करने की आवश्यकता है।
हाल ही में भारत ने ईरान के साथ सद्भावना का संकेत देते हुए प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पेट्रोटेक
2014 में इसराइल को बाहर रखा है जो जनवरी के महिने में होने जा रही है।
कूटनीटिक मामलों के जानकारों का मानना है कि अब समय है कि ईरान भारत के रूख और उसके द्वारा दिए गए समर्थन का बदला चुकाए जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उसके साथ खड़ा रहा। हालांकि यह लोग बहुत आशावादी नहीं है कि ऐसा होगा क्योंकि यदि ईरान का पुराना इतिहास देखें तो अच्छे समय में उसने यूरोपीय कंपनियों को आकर्षक ड्रिलिंग से संबंधित एवं अन्य ठेके दिए और उन देशों को नजरअंदाज कर दिया जो प्रतिकूल समय में उसके साथ खड़े रहे।
अतीत में भारत की कोशिश रही है कि शीत युद्ध की अवधि के दौरान जो देश गुटनिरपेक्ष रहे उनका समर्थन करे। दिलचस्प बात यह है कि ईरान अब गुटनिरपेक्ष देशों के संघ की अध्यक्षता कर रहा है। जैसे प्रतिबंध कम होते हैं और बुनियादी ढांचे और तेल से संबंधित टेंडर खुलते हैं तो यह ईरान के ट्रैक रिकार्ड के खिलाफ एक साहसी कदम होगा यदि भारत अब भी उसके व्यापारिक भागीदारों की प्राथमिकी में अपना स्थान रखता है।.jpg)
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